
24CITYLIVE/डैस्क:साल 2020 की है, जब पूरा देश कोरोना महामारी और लॉकडाउन की पाबंदियों से जूझ रहा था। तमिलनाडु के थूथुकुडी जिले के सथानकुलम में पी. जयराज और उनके बेटे जे. बेनिक्स अपनी मोबाइल की दुकान चलाते थे।
महज चंद मिनट की देरी से दुकान बंद करने और पुलिस से बहस होने के आरोप में बाप-बेटे को गिरफ्तार कर लिया गया। उस काली रात सथानकुलम पुलिस स्टेशन के भीतर जो हुआ, उसने पूरे देश की आत्मा को झकझोर कर रख दिया। तत्कालीन इंस्पेक्टर श्रीधर और उनके साथियों ने सत्ता और वर्दी के नशे में चूर होकर जयराज और बेनिक्स को रात भर बर्बर यातनाएं दीं। अमानवीय पिटाई और क्रूरता के कारण दोनों की हालत इतनी बिगड़ गई कि अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।

इस घटना के बाद जनता का आक्रोश सड़कों पर उतर आया और मामला सीबीआई को सौंपा गया। सीबीआई की जांच में यह साफ हो गया कि पुलिसकर्मियों ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करते हुए निर्दोष नागरिकों की जान ली थी। लगभग छह साल के लंबे कानूनी संघर्ष के बाद, 6 अप्रैल 2026 को मदुरै की विशेष अदालत ने इस मामले पर अपना अंतिम फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि रक्षक ही जब भक्षक बन जाएं, तो समाज में न्याय व्यवस्था का डर खत्म हो जाता है। न्यायाधीश ने इसे ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ मामला करार देते हुए दोषी इंस्पेक्टर श्रीधर समेत 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा सुनाई। यह फैसला न केवल जयराज और बेनिक्स के परिवार के लिए इंसाफ की जीत है, बल्कि उन सभी वर्दीधारियों के लिए एक कड़ा सबक भी है जो कानून से ऊपर खुद को समझते हैं।



